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उद्योग पर्व
अध्याय १२८
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वैशम्पाय़न उवाच
अद्यैव ह्यहमेतांश्च ये चैताननु भारत |  २७   क
निगृह्य राजन्पार्थेभ्यो दद्यां किं दुष्कृतं भवेत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति