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अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
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वासुदेव उवाच
अनुजानामि भीष्म त्वां वसूनाप्नुहि पार्थिव |  ४४   क
न तेऽस्ति वृजिनं किञ्चिन्मय़ा दृष्टं महाद्युते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति