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आदि पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिच्छोचन्तं शन्तनुं ध्यानमास्थितम् |  ५४   क
पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमव्रवीत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति