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आदि पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वतो भवतः क्षेमं विधेय़ाः सर्वपार्थिवाः |  ५५   क
तत्किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः |  ५५   ख
ध्याय़न्निव च किं राजन्नाभिभाषसि किञ्चन ||  ५५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति