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आदि पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
कथञ्चित्तव गाङ्गेय़ विपत्तौ नास्ति नः कुलम् |  ५८   क
असंशय़ं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति