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वन पर्व
अध्याय १९८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः सुखोपविष्टस्तं व्याधं वचनमव्रवीत् |  १८   क
कर्मैतद्वै न सदृशं भवतः प्रतिभाति मे |  १८   ख
अनुतप्ये भृशं तात तव घोरेण कर्मणा ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति