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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
यत्राधर्मं प्रणय़ते दुर्वले वलवत्तरः |  १   क
तां वृत्तिमुपजीवन्ति ये भवन्ति तदन्वय़ाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति