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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
अप्रकीर्णेन्द्रिय़ं प्राज्ञमत्यन्तानुगतं शुचिम् |  १४   क
शक्तं चैवानुरक्तं च युञ्ज्यान्महति कर्मणि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति