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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
रक्षितात्मा तु यो राजा रक्ष्यान्यश्चानुरक्षति |  १८   क
प्रजाश्च तस्य वर्धन्ते ध्रुवं च महदश्नुते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति