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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
यस्तु निःश्रेय़सं ज्ञात्वा ज्ञानं तत्प्रतिपद्यते |  २८   क
आत्मनो मतमुत्सृज्य तं लोकोऽनुविधीय़ते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति