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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते |  २९   क
शृणोति प्रतिकूलानि विमना नचिरादिव ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति