आश्रमवासिक पर्व  अध्याय १६

व्राह्मण उवाच

अप्यमित्रे दय़ावांश्च शुचिश्च भरतर्षभ |  १७   क
ऋजु पश्यति मेधावी पुत्रवत्पाति नः सदा ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति