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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
न जातु वलवान्भूत्वा दुर्वले विश्वसेत्क्वचित् |  ३६   क
भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति