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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
द्विषन्तं कृतकर्माणं गृहीत्वा नृपती रणे |  ६   क
यो न मानय़ते द्वेषात्क्षत्रधर्मादपैति सः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति