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शान्ति पर्व
अध्याय ९४
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वामदेव उवाच
शक्तः स्यात्सुमुखो राजा कुर्यात्कारुण्यमापदि |  ७   क
प्रिय़ो भवति भूतानां न च विभ्रश्यते श्रिय़ः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति