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अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
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वृषादर्भिरु उवाच
कुलम्भराननडुहः शतंशता; न्धुर्याञ्शुभान्सर्वशोऽहं ददानि |  १५   क
पृथ्वीवाहान्पीवरांश्चैव ताव; दग्र्या गृष्ट्यो धेनवः सुव्रताश्च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति