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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो |  १४   क
नाय़ं धर्मकृतो धर्मो न हिंसा धर्म उच्यते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति