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वन पर्व
अध्याय ८३
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पुलस्त्य उवाच
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रय़तमानसः |  १८   क
अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति