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उद्योग पर्व
अध्याय ९४
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वैशम्पाय़न उवाच
अनेकजननं सख्यं यय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |  १२   क
तय़ोस्त्वं न समो राजन्भवितासि कदाचन ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति