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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
ते भग्नाः प्रपतन्तश्च निघ्नन्तश्च परस्परम् |  ९३   क
न्यपातय़न्त च परान्पातय़ित्वा तथापिषन् ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति