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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
द्रौणेरिषूनर्जुनः संनिवार्य; व्याय़च्छतस्तद्द्विगुणैः सुपुङ्खैः |  ५४   क
तं साश्वसूतध्वजमेकवीर; मावृत्य संशप्तकसैन्यमार्छत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति