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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
अलङ्कृतस्तु स गिरिर्नानारूपविचित्रितैः |  ५   क
वभौ रुक्ममय़ैः काशैः सर्वतः पुरुषर्षभ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति