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भीष्म पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
स्वय़ं वैरं महत्कृत्वा पाण्डवैः सहसृञ्जय़ैः |  १३   क
युध्यस्व तानद्य रणे पश्यामः पुरुषो भव ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति