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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
अथास्य सूतस्य शिरो निकृत्य; भल्लेन वज्राशनिसंनिभेन |  १४   क
सुदर्शनस्यापि शिनिप्रवीरः; क्षुरेण चिच्छेद शिरः प्रसह्य ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति