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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
सकुण्डलं पूर्णशशिप्रकाशं; भ्राजिष्णु वक्त्रं निचकर्त देहात् |  १५   क
यथा पुरा वज्रधरः प्रसह्य; वलस्य सङ्ख्येऽतिवलस्य राजन् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति