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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
तं यान्तमश्वैः शशिशङ्खवर्णै; र्विगाह्य सैन्यं पुरुषप्रवीरम् |  ४   क
नाशक्नुवन्वारय़ितुं समन्ता; दादित्यरश्मिप्रतिमं नराग्र्यम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति