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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
शरैः सुतीक्ष्णैः शतशोऽभ्यविध्य; त्सुदर्शनः सात्वतमुख्यमाजौ |  ८   क
अनागतानेव तु तान्पृषत्कां; श्चिच्छेद वाणैः शिनिपुङ्गवोऽपि ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति