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शान्ति पर्व
अध्याय ९५
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वामदेव उवाच
यस्य योधाः सुसन्तुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताः |  ४   क
अल्पेनापि स दण्डेन महीं जय़ति भूमिपः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति