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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् |  १८   क
तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च ततः परम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति