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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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वसिष्ठ उवाच
अनध्याय़परो लोके शुनः स परिकर्षतु |  ५७   क
परिव्राट्कामवृत्तोऽस्तु विसस्तैन्यं करोति यः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति