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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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वसिष्ठ उवाच
शरणागतं हन्तु मित्रं स्वसुतां चोपजीवतु |  ५८   क
अर्थान्काङ्क्षतु कीनाशाद्विसस्तैन्यं करोति यः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति