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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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गौतम उवाच
उदपानप्लवे ग्रामे व्राह्मणो वृषलीपतिः |  ६६   क
तस्य सालोक्यतां यातु विसस्तैन्यं करोति यः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति