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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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विश्वामित्र उवाच
जीवतो वै गुरून्भृत्यान्भरन्त्वस्य परे जनाः |  ६७   क
अगतिर्वहुपुत्रः स्याद्विसस्तैन्यं करोति यः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति