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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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अरुन्धत्यु उवाच
नित्यं परिवदेच्छ्वश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मनाः |  ७०   क
एका स्वादु समश्नातु विसस्तैन्यं करोति या ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति