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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च |  ११   क
तव पुत्र कदा भूय़ो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति