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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
अथोपविष्टः प्रतिसत्कृतश्च; वृद्धेन राज्ञा कुरुसत्तमेन |  ५   क
प्रचोदितः सन्कथय़ां वभूव; धर्मानिलेन्द्रप्रभवान्यमौ च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति