आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ९५

जनमेजय़ उवाच

धर्मागतेन त्यागेन भगवन्सर्वमस्ति चेत् |  १   क
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति