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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत्किञ्चिद्वसु विद्यते |  २५   क
सर्वं तदिह यज्ञे मे स्वय़मेवोपतिष्ठतु |  २५   ख
स्वर्गं स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वय़मेव तु ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति