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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
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वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़ेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वय़म् |  ३०   क
धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वय़म् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति