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विराट पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य निर्मुच्यमानस्य कवचात्काय़ आवभौ |  १४   क
समय़े मुच्यमानस्य सर्पस्येव तनुर्यथा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति