वन पर्व  अध्याय ९५

लोमश उवाच

असंशय़ं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत |  १६   क
या तु त्वय़ि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति