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वन पर्व
अध्याय ९५
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लोमश उवाच
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् |  १८   क
उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति