वन पर्व  अध्याय ९५

लोपामुद्रो उवाच

ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुमिहेश्वर |  २०   क
क्षणेन जीवलोके यद्वसु किञ्चन विद्यते ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति