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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
सभाजितः ससैन्यस्तु प्रतिनन्द्याथ मत्स्यराट् |  ४   क
विसर्जय़ामास तदा द्विजांश्च प्रकृतीस्तथा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति