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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
विक्षोभय़न्तं सेनां ते त्रासय़न्तं च पार्थिवान् |  २४   क
धनञ्जय़मपश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति