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शान्ति पर्व
अध्याय १०१
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भीष्म उवाच
उभे प्रज्ञे वेदितव्ये ऋज्वी वक्रा च भारत |  ४   क
जानन्वक्रां न सेवेत प्रतिवाधेत चागताम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति