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विराट पर्व
अध्याय ५५
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अर्जुन उवाच
धर्मपाशनिवद्धेन यन्मय़ा मर्षितं पुरा |  ५   क
तस्य राधेय़ कोपस्य विजय़ं पश्य मे मृधे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति