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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम् |  १२   क
भ्रातुरागमनं चैव चिन्तय़न्पर्यतप्यत ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति