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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्योन्यं प्रधावन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे |  ४४   क
ततः शव्देन महता प्रचकम्पे वसुन्धरा ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति