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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
हते स्म कर्णे सरितो न स्रवन्ति; जगाम चास्तं कलुषो दिवाकरः |  ४७   क
ग्रहश्च तिर्यग्ज्वलितार्कवर्णो; यमस्य पुत्रोऽभ्युदिय़ाय़ राजन् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति