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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सूत उवाच
न सम्भ्रमो मे वार्ष्णेय़ विद्यते सत्यविक्रम |  १५   क
यद्यपि स्यात्सुसङ्क्रुद्धो जामदग्न्योऽग्रतः स्थितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति